जन्माष्टमी पर्व भादों की अष्टमी का मनाया जाता है। इस दिन भगवान कृष्ण का जन्म होता है। इस पर्व को 2 दिन मनाया जाता है। एक “साधु संत” के द्वारा और दूसरा ग्रहस्त लोगों के द्वारा। इस बार “19” को गृहस्थ लोग जन्माष्टमी मना रहे हैं। इसी दिन भक्त उपवास रखते हैं। धूप, दीप प्रज्ज्वलित और पांचों उपचार पूजन किया जाता है। और कान्हा को तुलसी की माला भी पहनाया जाता है। कान्हा जी को पालने में झुलाया जाता है। एक अखंड दीप जलाते है जो रात 12 बजे तक जलता है। रात 12 बजे भगवान का जन्म होता है “खीरे” को फोड़कर भगवान कृष्ण जन्म होता है। कुछ लोग लड्डू गोपाल को बिठाते है । और कुछ सुपारी में भगवान का जन्मत्सव मानते है।
- इस दिन भगवान कृष्ण का उपवास, पूजन व मंत्र जप करने से सारे विघ्न दूर होते है। मंत्र:”कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने, प्रणत क्लेश नाशाय गोविंदये नमो नमः ।”
दही हांडी पर्व का महत्व
- जन्माष्टमी के उपलक्ष में दही हांडी धूमधाम से मनाया जाता है जन्माष्टमी के अगले दिन” दही हांडी “पर्व मनाया जाता है यह भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं को दर्शाता हैं।
- बचपन में भगवान कृष्ण पड़ोसियों के घर से माखन चुराकर खाते और मटकिया भी तो डालते थे तभी ये से परंपरा शुरू हुई है।
- भगवान कृष्ण के डर से गोपियां अपने” दही मक्खन को चुरा कर काफी ऊंचाई पर रखती थी पर वह अपने शाखाओं के साथ के मिलकर पिरामिड बनाकर मटका तोड़ देते और दही खाकर वहां से चुपके से भाग जाते।
- बचपन में कृष्ण बहुत ही नटखट स्वभाव के थे। इसी कारण दही हांडी पर्व को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है।
- दही हांडी भारत का सांस्कृतिक “त्योहार है जो लगभग भारत के सभी हिस्सों में मनाया जाता है इस अवसर पर” गोपाला “( युवा बच्चे ) ऊंचाई पर लटके मिट्टी के बर्तन को तोड़ते हैं इसे बहुत ही शुभकारी माना जाता है। दही हांडी एक लोकप्रिय त्यौहार है ।
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